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गो-त्रिरात्रि-व्रत

गोत्रिरात्रि व्रत भाद्रपद शुक्ल पक्ष एकादशी से प्रारम्भ होता हैं,इसको राजस्थान में(गउ त्रायत)के नाम से भी जाना जाता है | तिथि क्षय वृद्धि हो तो व्रत नहीं होता है|

व्रत करने की विधि :-गोत्रिरात्रि व्रत भाद्रपद शुक्ल पक्ष एकादशी से प्रारम्भ होता हैं,और त्रयोदशी तक चलता है किन्तु कही कही पूर्णिमा तक भी करते है| इस व्रत में एकादशी व द्वादशी (ग्यारस बारस) को निराधार  (निगोट) रहते है| त्रयोदशी (तेरस) को फलाहार या सेगार लिया जाता है,ध्यान रहे सेगार में गौ से प्राप्त किसी भी द्रव्य का प्रयोग नहीं होता है| {जैसे गाय का दूध या दही घी आदि } फिर चतुर्दशी (चौदश) को निराधार रहकर के पूर्णिमा को पारणा करना चाहिए | चार दिन तक गो व ठाकुर जी का पूजन करना चाहिए, इस तरह चार साल तक इस व्रत को करना चाहिए| कुंवारी कन्या व सुहागिन स्त्रियाँ दोनों इस व्रत को कर सकती है|
उद्यापन विधि:- उद्यापन के समय गो दान तथा 4 छाबड़ी में अलग अलग फल,श्रृंगार सामग्री,पुष्प,चारा,का दान करना चाहिए||चार या पांच जोड़ो को भोजन तथा गौ पूजन गोपाल जी का पूजन व हवन करवाना चाहिए || आचार्य गजानन शास्त्री
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